Saturday, July 24, 2010

बुढिया




थी वोह एक छोटी सी गुडिया
नाम था जिसका ऐश्वर्या
हस्ती खेलती मुस्कुराती
सब के मन को ले भाति
झूट कपट से ना था नाता
सच के पथ पर चलते जाती
संस्कृति का रूप थी वह
एकता का स्वरुप थी वह
जीवन में उसकी एक ही आशा
सुका शांति की अभिलाषा
लगी उसे एक ऐसी नज़र
जीवन उसका हुआ दूभर
वृद्ध उम्र में पड़े उसके चरण
हर दर से हुई वह बेघर
दर्द मिताई नई आस जगाये
बढती गई वह लेकर काठी
जीवन से खेलती आँख मिचोली
मृत्यु की और बढती जाती
जो हारती थी सबके दुःख को
अब तरस रही है सुख को
उसके नयन से झलकती आंसू
बीते दिन जब याद आते
तब जिसका था हर कई
अब ना उसे पूछता कोई
गली गली भटकती रही वह
अपने जीवन को कोसती रही वह
बदल गया था उसका जीवन
पर बदला ना उसका मन
कहो ना उसे तुम एक बुढिया
क्यूंकि है वह एक छोटी सी गुडिया
नाम है उसका ऐश्वर्या
- महेश प्रजापति

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